अहमदनगर के मुस्लिम समाज की तालीमी तारीख में चाँद सुल्तान हाईस्कूल और नागौरी मुस्लिम मिसगर जमात ट्रस्ट के तालीमी इदारे सिर्फ स्कूल और कॉलेज नहीं हैं। ये हमारे बुज़ुर्गों की कुर्बानियों, दानशूरों की सखावत और कई नस्लों की खामोश मेहनत की जीती-जागती निशानियाँ हैं।
इन तालीमी इदारों की बुनियाद उस दौर में रखी गई, जब मुस्लिम समाज में तालीम के मौके बहुत कम थे। गरीब घरों के बच्चों के लिए अच्छी तालीम हासिल करना आसान नहीं था। उस मुश्किल दौर में अंजुमन-ए-तरक़्क़ी-ए-उर्दू के बानी बुज़ुर्गों ने चाँद सुल्तान हाईस्कूल का चिराग रोशन किया। इसी तरह नागौरी मुस्लिम मिसगर जमात के बानी और मोहसिन बुज़ुर्गों ने अपनी कौम के बच्चों तक तालीम पहुँचाने के लिए मिसगर के तालीमी इदारे कायम किए।
इन इदारों को कायम करने वाले बुज़ुर्ग अपने दौर की पढ़ी-लिखी, दूरअंदेश और समाज में इज्जत रखने वाली शख्सियतें थीं। उनमें उलेमा, दानिशमंद, ताजिर, समाजी खिदमतगार और दानशूर अफराद शामिल थे। उनकी पहचान सिर्फ तालीमी सनदों से नहीं थी; उनकी असल काबिलियत समाज का दर्द महसूस करना, लोगों को एकजुट करना और आने वाली नस्लों के मुस्तकबिल के लिए अपनी दौलत, वक्त तथा जिंदगी कुर्बान करना थी।
किसी ने अपनी जमीन दी, किसी ने जमा-पूँजी खर्च की, किसी ने घर-घर जाकर चंदा जमा किया और किसी ने बिना किसी ओहदे या शोहरत की ख्वाहिश के अपनी पूरी जिंदगी इन इदारों की खिदमत में गुजार दी। उन बुज़ुर्गों के सामने कोई जाती फायदा नहीं था। उनकी सिर्फ एक तमन्ना थी—
“हमारी कौम का कोई भी बच्चा गरीबी और मजबूरी के कारण तालीम से महरूम न रहे।”
मगर कितनी अफसोसनाक बात है कि जिन बुज़ुर्गों ने अपना सब कुछ कुर्बान करके इन इदारों को खड़ा किया, आज उनकी पूरी तारीख, तालीमी काबिलियत, समाजी खिदमात और कुर्बानियों का तफसीली जिक्र नई नस्ल के सामने दिखाई नहीं देता।
जिन बानी बुज़ुर्गों के नाम इन इदारों की हर ईंट पर लिखे जाने चाहिए थे, उनके नाम आज धुँधले पड़ते जा रहे हैं; जबकि आपसी विवादों और मुकदमों में शामिल लोगों के नाम हर तरफ सुनाई दे रहे हैं। इससे ज्यादा दर्दनाक और शर्मनाक हालत क्या हो सकती है?
इन इदारों में “बानियान और मोहसिनान-ए-इदारा” के नाम से एक इज्जतदार यादगारी फलक लगाया जाना चाहिए। उस पर तमाम बानी बुज़ुर्गों के नाम, उनकी तालीमी काबिलियत, समाजी खिदमात और संस्थाओं के लिए दी गई कुर्बानियों का जिक्र होना चाहिए। इससे आज के तलबा व तालिबात को मालूम होगा कि जिस इदारे में वे तालीम हासिल कर रहे हैं, उसकी बुनियाद किन अज़ीम शख्सियतों की मेहनत पर रखी गई थी।
आज इन इदारों की हालत देखकर हर दर्दमंद दिल रोता है
जिन इदारों को बुज़ुर्गों ने इत्तेहाद, मोहब्बत और कुर्बानी से कायम किया, आज वही इदारे अंदरूनी इख्तिलाफ, अदालती मुकदमों, शिकायतों, जवाबी शिकायतों और गुटबाजी के कारण बदनामी का सामना कर रहे हैं।
अदालत में अपना हक माँगना हर फरीक का कानूनी हक है। मगर अदालती लड़ाई को सोशल मीडिया, अखबारों और सार्वजनिक मंचों पर लाकर एक-दूसरे के खिलाफ बेहूदा अल्फाज़ इस्तेमाल करना, इल्जाम लगाना और किरदारकुशी करना किसी भी सूरत में मुनासिब नहीं है।
इससे किसी एक फरीक की नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम समाज और बुज़ुर्गों की विरासत की रुसवाई हो रही है। जब संस्था का नाम तालीम के बजाय मुकदमों और झगड़ों के कारण लिया जाने लगे, तो यह हम सबके लिए गहरे आत्ममंथन का मुकाम है।
बड़ों के झगड़ों की सजा मासूम तलबा व तालिबात को क्यों मिले?
इन अंदरूनी इख्तिलाफात की सबसे भारी कीमत संस्था में तालीम हासिल करने वाले मासूम तलबा व तालिबात चुका रहे हैं। जिस उम्र में उनके हाथों में किताबें और दिलों में बड़े ख्वाब होने चाहिए, उसी उम्र में उन्हें संस्था के झगड़े, गुटबाजी और तनाव की बातें सुननी पड़ रही हैं।
जब स्कूल के बारे में बार-बार विवादों की खबरें सामने आती हैं, तो तलबा व तालिबात के दिलों में खौफ और बेचैनी पैदा होती है। उन्हें अपने इदारे का नाम लेते हुए फख्र महसूस होना चाहिए; मगर लगातार बदनामी के कारण उनके मासूम दिलों पर क्या गुजरती होगी, क्या हमने कभी यह सोचने की कोशिश की है?
तलबा व तालिबात किसी फरीक या गुट की मिल्कियत नहीं हैं। वे पूरी कौम की अमानत, अपने वालिदैन की उम्मीद और आने वाले कल की पहचान हैं। बड़ों के झगड़ों की सजा मासूम बच्चों को देना सबसे बड़ी नाइंसाफी है।
असातिज़ा और मुलाज़मीन भी खामोश तकलीफ सह रहे हैं
अंदरूनी इख्तिलाफ का गहरा असर इदारों के असातिज़ा और दूसरे मुलाज़मीन पर भी पड़ता है। वे लगातार दबाव, डर और बेचैनी के माहौल में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने पर मजबूर होते हैं।
उन्हें अपनी नौकरी और मुस्तकबिल की फिक्र रहती है। यह डर भी सताता है कि कहीं उन्हें किसी एक फरीक से जोड़कर परेशान न किया जाए। ऐसी हालत में असातिज़ा पूरी तवज्जो और सुकून के साथ तलबा व तालिबात की तालीम और तरबियत पर ध्यान कैसे दे पाएँगे?
असातिज़ा का काम इल्म की रोशनी फैलाना और नई नस्ल की रहनुमाई करना है। उन्हें गुटबाजी में खींचना, किसी की हिमायत या मुखालिफत के लिए मजबूर करना अथवा उनके दिलों में रोजगार का डर पैदा करना तालीमी माहौल को तबाह कर सकता है।
वालिदैन और दानशूरों का भरोसा टूटना सबसे बड़ा नुकसान होगा
हर माँ-बाप अपने बच्चों को बड़े भरोसे के साथ स्कूल भेजते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि वहाँ उनके बच्चों को अच्छी तालीम, तहज़ीब, अमन और महफूज़ माहौल मिलेगा। मगर संस्था के अंदरूनी झगड़ों की खबरें सुनकर वालिदैन के दिलों में अपने बच्चों के मुस्तकबिल को लेकर डर पैदा होना स्वाभाविक है।
इन इदारों को कायम करने और सँभालने में समाज के दानशूर अफराद का बहुत बड़ा हिस्सा रहा है। कोई जकात देता है, कोई सदका और इमदाद देता है, तो कोई गरीब तलबा व तालिबात की फीस, किताबों और दूसरी जरूरतों की जिम्मेदारी उठाता है।
मगर जब कोई दानशूर शख्स संस्था के बारे में लगातार मुकदमों, इल्जामों और गुटबाजी की खबरें सुनता है, तो उसका भरोसा कमजोर होने लगता है। उसके दिल में सवाल पैदा होता है कि उसकी दी हुई रकम तलबा व तालिबात की तालीम के काम आएगी या आपसी झगड़ों में बर्बाद हो जाएगी।
दानशूरों का भरोसा कई बरसों की पाकीजा खिदमत से कायम होता है, मगर एक विवाद उसे पलभर में तोड़ सकता है। अगर मदद करने वाले हाथ पीछे हट गए, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत गरीब, यतीम और जरूरतमंद तलबा व तालिबात को चुकानी पड़ेगी।
समाज के बुज़ुर्ग खामोश तमाशाई न रहें
अहमदनगर के उलेमा, बुज़ुर्गों, असातिज़ा, वकीलों, डॉक्टरों, ताजिरों, दानशूरों और मोअतबर शख्सियतों को अब खामोश नहीं रहना चाहिए। दोनों इदारों को बचाने के लिए गैर-जानिबदार और बेदाग बुज़ुर्गों की “तालीमी इदारा तहफ्फुज़ और सुलह कमेटी” कायम की जाए।
दोनों फरीकों को एक जगह बैठाकर उनकी बात सुनी जाए। जो मामले अदालत में हैं, उनका फैसला अदालत पर छोड़ दिया जाए; मगर अदालत के बाहर एक-दूसरे की बेइज्जती, तल्ख बयानबाजी और सोशल मीडिया पर चलने वाली मुहिम फौरन बंद कराई जाए।
समाज दोनों फरीकों से साफ अल्फाज़ में कहे—
अदालत की लड़ाई अदालत तक महदूद रखिए।
तलबा व तालिबात, असातिज़ा और मुलाज़मीन को अपने झगड़ों से दूर रखिए।
अपने हक की हिफाजत कीजिए, मगर संस्थाओं का वकार और बच्चों का मुस्तकबिल दाँव पर मत लगाइए।
कुर्सी और ओहदे से ऊपर उठकर बानी बुज़ुर्गों की अमानत बचाइए।
आज जो किसी ओहदे पर है, कल उसकी जगह कोई दूसरा होगा। मगर संस्था हमेशा समाज की रहेगी। अदालत का फैसला देर-सवेर आ जाएगा; लेकिन यदि तब तक संस्था का वकार खत्म हो गया, वालिदैन का भरोसा टूट गया, असातिज़ा मायूस हो गए और दानशूरों ने मदद से हाथ खींच लिया, तो उस नुकसान की भरपाई कोई फैसला नहीं कर पाएगा।
उन मरहूम बुज़ुर्गों की रूह हमसे सवाल कर रही होगी…
एक पल के लिए अपनी आँखें बंद करके उन मरहूम बुज़ुर्गों को याद कीजिए जिन्होंने अपनी जरूरतें कम करके कौम के बच्चों के लिए ये तालीमी इदारे कायम किए थे।
उन्होंने हमें सिर्फ स्कूल और कॉलेज की इमारतें नहीं दीं। उन्होंने हमें इल्म का चिराग, भरोसे की अमानत और बेहतर मुस्तकबिल की उम्मीद सौंपी थी।
आज उनकी रूह हमसे यह सवाल कर रही होगी—
“हमने जिन इदारों को अपना खून-पसीना बहाकर बनाया था, क्या तुम उन्हें अपनी जिद, गुस्से और दुश्मनी की आग में जलने दोगे?”
कहीं ऐसा न हो कि आने वाली नस्लें भी हमसे पूछें—
“जब हमारे बुज़ुर्गों की बनाई हुई तालीमी अमानत बिखर रही थी, तब समाज के जिम्मेदार लोग कहाँ थे?”
उस सवाल का जवाब देना हम सबके लिए बहुत मुश्किल होगा।
इसलिए खुदा के वास्ते अपने गुस्से, जिद और जाती इख्तिलाफ को किनारे रखिए। बातचीत, इत्तेहाद और सुलह का रास्ता खोलिए। अदालत का मामला अदालत पर छोड़िए और दोनों तालीमी इदारों की इज्जत तथा तलबा व तालिबात के मुस्तकबिल की हिफाजत कीजिए।
किसी एक फरीक की जीत नहीं—चाँद सुल्तान हाईस्कूल और मिसगर के तालीमी इदारों की हिफाजत ही पूरे समाज की असली जीत होगी!
मुस्लिम समाज के नाम एक दर्दभरी पुकार — शाकीर शेख
मोबाइल : ९८२२५५००२३
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